भोजपुरी साहित्य जगत के लिए आज का दिन अत्यंत गौरवपूर्ण एवं ऐतिहासिक रहा। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अनिल सिन्हा ‘बहुमुखी’ की भोजपुरी नाटक कृति “दू भाव ना होई” का भव्य लोकार्पण समारोह उद्गार सभागार, स्याही प्रकाशन परिसर, नरायनपुर, भोजूबीर, सिन्धोरा रोड, वाराणसी में गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात विद्वान एवं स्याही प्रकाशन के प्रकाशक-प्रधान सम्पादक पण्डित छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ ने की। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. (प्रो.) संगीता पण्डित, संकाय प्रमुख, संगीत संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी की गरिमामयी उपस्थिति रही। विशिष्ट अतिथि के रूप में भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर. एन. सिंह ने समारोह की शोभा बढ़ाई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार एवं भूतपूर्व जिला विकास अधिकारी डॉ. दयाराम विश्वकर्मा रहे, जिन्होंने नाटक की विषयवस्तु, भाषा-शैली एवं सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए इसे समकालीन भोजपुरी रंगमंच की सशक्त कृति बताया। वक्ता के रूप में भूतपूर्व जिलाध्यक्ष, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद, उ० प्र० श्री शैलेन्द्र सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए रचना को सामाजिक चेतना का दर्पण बताया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में पण्डित छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ ने कहा कि ” भोजपुरी साहित्य की परंपरा को सुदृढ़ करते हुए यह नाटक-पुस्तक “दू भाव ना होई” जीवन के द्वंद्व, समाज की विडंबनाओं और मानवीय संवेदनाओं को सशक्त संवादों व प्रभावशाली दृश्य-रचना के माध्यम से मंचीय जीवंतता प्रदान करती है। पाठक इसे पढ़ते हुए केवल कथा नहीं, बल्कि रंगमंच की धड़कन, संघर्ष और सजीव अनुभूति को गहराई से महसूस करता है।” मुख्य अतिथि डॉ. (प्रो.) संगीता पण्डित ने साहित्य और संस्कृति के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए रचना की सराहना की।
गोष्ठी में बी. के. गुप्ता ‘तनहा’ जौनपुरी, विजय चन्द्र त्रिपाठी, राम नरेश पाल, दिनेश दत्त पाठक, डॉ. जगदीश नारायण गुप्त, करुणा सिंह, कैलाश नाथ यादव, कवि बिमल बिहारी, नन्दलाल राजभर ‘नन्दू’, अजफर बनारसी, माधुरी मिश्रा, राजेन्द्र गुप्त बावरा, देवेन्द्र पाण्डेय बेचैन आत्मा, सुनील कुमार सेठ, डा0 लियाकत अली, बुद्धदेव तिवारी, तेजबली अनपढ़, अलियार प्रधन, संध्या श्रीवास्तव, ‘आशिक’ बनारसी, खलील अहमद राही, कलाम बनारसी तथा जी.एल. पटेल ‘अयन’ सहित अनेक साहित्यकारों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
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